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सचित्र समाचार
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हिंदी लिखना,पढना, बोलना और हिंदी में

"कौन कहता है कि युवा वर्ग हिंदी नहीं सीखना चाहता ?? हो सकता है भारत में ऐसा हो,क्योंकि वो तो इंडिया बन चुका है परन्तु यू के भारतीय युवाओं में पूरा जोश देखा गया वे हिंदी बोलना, लिखना,पढना तो क्या हिंदी में सोचना भी चाहते हैं. "


ये बात है इंग्लैण्ड की एक यूनिवर्सिटी में हुए हिंदी सम्मलेन की. २४ जून से २६ जून तक बर्मिघम की एस्टन यूनिवर्सिटी में कुछ स्थानीय संस्थाओं ने भारतीय उच्चायोग के सहयोग से तीन दिवसीय यू के क्षेत्रीय हिंदी सम्मलेन २०११ का आयोजन किया.


काफी बड़ा सम्मलेन था भारत से डॉ.परमानंद पांचाल, डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के अलावा रूस, इजराइल, डेनमार्क, आदि से आए हिंदी के कई विद्वानों के साथ बहुत से स्थानीय गुणीजन ,वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार भी मौजूद थे.


तीन दिनों तक चले इस सम्मलेन में कई विषयों पर चर्चा हुई. इस दौरान एक बात जो साफ़-साफ़ निकल कर सामने आई वह यह कि, कौन कहता है कि युवा वर्ग हिंदी नहीं सीखना चाहता ?? हो सकता है भारत में ऐसा हो,क्योंकि वो तो इंडिया बन चुका है परन्तु यू के भारतीय युवाओं में पूरा जोश देखा गया. वे हिंदी बोलना, लिखना,पढना और यहाँ तक कि हिंदी में सोचना भी चाहते हैं उन्होंने इस सम्मलेन में भी बढ- चढ़ कर हिस्सा लिया. उनके उत्साह को देखकर भारत से आये कुछ युवा प्रतिभागी तो ये कहते भी पाए गए कि भाई आप लोग कुछ ज्यादा ही भारतीय हो. हम तो यहाँ आपके साथ निभा ही नहीं पा रहे हैं.


साभार - स्पंदन


उक्त रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार सुश्री शिखा वार्ष्णेय के चिट्ठे स्पंदन से ली गई है. हिंदी, अंग्रेजी और रूसी भाषा पर सामान अधिकार रखने वाली शिखा ने इस सम्मलेन में हिंदी वेब पत्रकारिता पर एक आलेख पढ़ा था.

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स्वर से, लय से, ताल सहित हो, बजती रहना तब तक वीणे | अहितो से यह देश रहित हो, विक्रम - क्रम-धृत जब तक वीणे